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शनिवार, जनवरी 04, 2014

यदि भारत देश में कोई ईमानदार जज है तो "संज्ञान" लेकर दिखाएँ

दिल्ली की सड़कों पर राजनीतिकों का चलता हैं गुंड़ा-राज

डरपोक सुप्रीम कोर्ट-दिल्ली हाईकोर्ट-निचली कोर्ट के जज, दिल्ली नगर निगम और दिल्ली पुलिस के आयुक्त तबादले के डर से ‘संज्ञान’ नहीं लेते हैं। इस कारण से कानून, पुलिस और न्यायालय बनें मात्र एक ढ़ोग। कानून हमारे बाप की जागीर है कुछ ऐसा ही संदेश देते होडिग्स.

दिल्ली: आज पूरे उत्तमनगर सहित पूरी दिल्ली में ’दिल्ली प्रिसेंशन आॅफ डिफेसमेंट आॅफ प्रोपटी एक्ट 2007 कानून को ताक पर रखकर उत्तम नगर, पंजाबी बाग, त्रिनगर और रोहिणी आदि सहित अनेक जगहों में बिजली के खम्बों, टेलीफोन के खम्बों, सरकारी स्कूलों की इमारतों, दिल्ली नगर निगम के पार्कों और सार्वजनिक स्थानों पर हजारों की संख्या में पोस्टर्स/होडिग्स लगा रखे है। इनको देखकर ऐसा लगता है कि दिल्ली की सड़कों पर पूंजीपतियों व राजनीतिकों का ही ‘गुंड़ा-राज’ चलता हैं और पोस्टर्स/होडिग्स कुछ ऐसा ही संदेश देते हैं कि कानून हमारे बाप की जागीर है। उपरोक्त कानून के तहत सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन भी है।

उपरोक्त कानूनानुसार होर्डिग्स व बैनर आदि पर कार्यवाही करने हेतु दिल्ली नगर निगम व दिल्ली पुलिस को अधिकार दिया हुआ है। लेकिन जब बाड़ ही खेत को खाए तब उसको कौन बचाए ? जब कानून के रक्षक ही भक्षक बन जाए, तब उन पर कानूनी कार्यवाही की सोचना भी बेमानी है। अंधे-बहरे और डरपोक सुप्रीम कोर्ट - दिल्ली हाईकोर्ट - निचली कोर्ट के जज, दिल्ली नगर निगम और दिल्ली पुलिस के आयुक्त व क्षेत्राीय थानाध्यक्ष अपने तबादले या शोषित किये जाने के डर से ‘संज्ञान’ नहीं लेते हैं। इस कारण से दिल्ली के लगभग सभी थानों के आसपास अनेक होडिग्स लगे रहते हैं और कानून, पुलिस और न्यायालय मात्र एक ढ़ोग बनकर रह गये है।
आज के समय में आजाद व आधुनिक भारत का सपना देखने वाले नेताजी सुभाषचन्द्र बोस को आज दिलों में नहीं खम्बों पर जगह मिल रही है। उपरोक्त कानून की कार्यवाही प्रक्रिया की जांच करने के लिए शकुन्तला प्रेस ने कुछ दिनों के लिए आज से लगभग पांच साल पहले सरकारी संपत्ति खराब करते हुए खम्बों पर एक बैनर बंधा, मगर किसी ने चालान नहीं काटा, क्योंकि किसी के पास फुसत ही नहीं है। जब नेताओं ने होडिग्स लगा रखे उनका कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता हैं, फिर हमारा कोई क्या बिगाड़ लेगा ? ऐसी मानसकिता की वजह से कुछ पूंजीपतियों व अन्य लोगों ने भी जगह-जगह पर अपने होडिग्स लगा दिये है। यह तो कुछ भी नहीं शकुन्तला प्रेस के सूत्रों की बात माने तो उत्तमनगर के पिनकोड 110059 (जिसमें पांच विधानसभा के क्षेत्रों का समावेश है) में 10000 से भी अधिक होडिग्स लगे हुए है, जो कानूनों को पैरों तले रौंद रहे हैं। शकुन्तला प्रेस के पास 200 से भी अधिक ऐसे फोटोग्राफ्स(जिनको अपनी फेसबुक की आई डी www.facebook.com/kaimara200/photos पर डाऊनलोड किया हुआ) है, राजनीतिकों व अमीरों ने कानूनों को अपने बाप की ज़ागीर बना रखा है और हमारे कानून और व्यवस्था उनके सामने लाचार है। इनमें पार्षद, विधायक और सांसद भी शामिल है। यदि इस संदर्भ में कोई शिकायत आती है तब उस कोई कार्यवाही नहीं की जाती है और किसी ‘नेता’ का फोन आने पर ऐसे मामले चुटकी बजाते ही रफा-दफा हो जाते है। यदि दिल्ली पुलिस व दिल्ली नगर निगम को कोई कार्यवाही भी करनी पड़ जाती है तब किसी पोस्टर चिपकाने वाले या होडिग्स को खम्बें पर चढ़कर बांधने वाले मजबूर व गरीब मजदूर को पकड़कर उसको परेशान करती है और होडिग्स की बिना फोटोग्राफी / वीडियो बनवाये ही उतार देती है या डंडे की सहायता से नीचे खडे़-खडे़ ही फाड़ देती है। भाई-भतीजावाद व पक्षपात करते हुए प्रथम सूचना रिर्पोट (F.I.R) दर्ज नहीं करती है। इसी प्रकार दिल्ली नगर निगम के अफसर भी तबादले या शोषित किये जाने के डर के कारण कोई कार्यवाही नहीं करते हैं।
गौरतलब है बिजली के खम्बों पर चढ़कर होडिग्स को बांधने वाले गरीब और मजदूरों के साथ अनेक दुखद घटना घट चुकी है। जिसमें उनके दोनों हाथ या पैर आदि इस तरह से जख्मी हो चुके है कि आज वो किसी भी तरह का काम करने में असमर्थ है और दूसरों पर मोहताज होकर अपना जीवन जी रहें है।
आज पूरा उत्तमनगर पोस्टरों व होडिग्स से अटा पड़ा है और बिन्दापुर व उत्तम नगर के थानाध्यक्ष बेखबर है। जनलोकपाल कानून बनवाने की प्रक्रिया से निकली ‘‘आम आदमी पार्टी’’ भी अपने कार्यकर्ताओं और नवनियुक्त विधायकों को संभालने में नाकाम हुई है। जहां एक ओर ‘‘आम आदमी पार्टी’’ के विकासपुरी विधानसभा से जीते महेन्द्र यादव के समर्थकों ने पूरे इलाके को पोस्टरों / होडिग्सों से भर दिया है। वहीं दूसरी ओर उत्तमनगर विधानसभा में बीस साल बाद भाजपा को मिली जीत से अति उत्साहित भाजपा के समर्थकों ने पोस्टरों व होडिग्सों से पूरे क्षेत्र को बदरंग बना दिया है। इसी प्रकार उत्तमनगर व विकासपुरी विधानसभा के हारे हुए अनेक उम्मीदवारों ने समर्थन देने का ‘आभार’ व्यक्त करने या ‘धन्यवाद’ करने के लिए पोस्टरों व होडिग्सों से पूरे क्षेत्र को बदरंग करने में बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहे है। एक कानून को बनवाने के लिए दूसरे कानून का उल्लंघन करना कहां तक उचित है? 
किसी नेता का जन्मदिन हो या कोई त्यौहार हो आदि की शुभकामनायें वाले पोस्टरों/होडिग्स देखकर ऐसा लगता है कि हर तीसरा व्यक्ति युवा नेता है और इन दिनों युवा नेताओं की तादाद बढ़ गई है। पोस्टरों/होडिग्स को छापने वाले प्रिन्टरों ने कानूनी कार्यवाही से बचने का तरीका खोजा है कि पोस्टरों/होडिग्स पर न प्रिंटिग प्रेस का नाम होता है व पोस्टरों/होडिग्स छपवाने वाले न किसी को ‘बिल’ देते हैं और काफी प्रिन्टर्स के पास तो बिलबुक ही नहीं होती है और उनकी फर्म के बैंक खाते भी नहीं होते हैं। इस तरह से होडिग्स में बहुत बड़े स्तर पर काले धन का प्रयोग होता है. इससे सरकार को सेवाकर के रूप में मिलने वाले ‘राजस्व’ की हानि होती है और पूरा शहर गंदा होता है। जब ऐसे कानूनों का पालन करवाने की ही व्यवस्था नही है तब ऐसे कानून बनाने का क्या फायदा है? ऐसे कानून की किताबों को फाड़कर फैंक देना चाहिए या ऐसे कानूनों को खत्म कर देना चाहिए।
आयुक्त-दिल्ली नगर निगम व दिल्ली पुलिस, डी.सी.पी, दिल्ली पुलिस-राजौरी गार्डन, थानाध्यक्ष-बिन्दापुर और थानाध्यक्ष-पंजाबी बाग, दिल्ली को इस संदर्भ में पत्रकार रमेश कुमार जैन उर्फ ‘निर्भीक’ द्वारा एक पत्र भी लिखा था कि कृपया करके संस्थाओं चुनाव से संबंधित होर्डिग के अलावा अन्य सभी प्रकार के होर्डिग्स व पोस्टर लगाने वालों के खिलाफ सख्त कार्यवाही करें। जो उपरोक्त कानून के तहत सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का भी उल्लंघन है। उपरोक्त कानूनानुसार होर्डिग्स व बैनर आदि पर कार्यवाही करने हेतु आपको व दिल्ली पुलिस को अधिकार दिया हुआ है। आपके विभागों के अधीन अधिकृत कर्मचारी भाई-भतीजावाद की रणनीति अपनाते हुए उचित कार्यवाही नहीं कर रहे हैं। मेरे पास उत्तम नगर व कई अन्य स्थानों की लगभग दो सौ से भी ज्यादा फोटोग्राफ्स है। जिनपर कार्यवाही नहीं हो सकती है, क्योंकि वे होर्डिग्स उँची पहुंच वालों के है। जिनमें सांसद, विधायक व पार्षद शामिल है। अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि ‘दिल्ली प्रिसेंशन आॅफ डिफेसमेंट आॅफ प्राॅपर्टी एक्ट 2007 कानून’ को सख्ती से लागू करवाये और छुटन नेताओं व लोगों के बीच उपरोक्त कानून का डर पैदा करें। अगर आप ऐसा नहीं कर सकते हैं तब कृपया आम आदमी द्वारा हाऊस टैक्स आदि के माध्यम से आपको दिया धन को उसे मात्रा कुछ समाचार पत्रों में विज्ञापन देकर खराब न करें। बल्कि उस पैसों को जनहित के कार्यो में लगाये। मगर इस पत्र पर आज तक कोई कार्यवाही नहीं की।
पाठकों, ऐसा नहीं है कि इस संदर्भ में संबंधित विभागों को मालूम नहीं है कभी-कभी मात्र दिखावे के लिए कार्यवाही के आदेश दिये जाते हैं मगर नियमित रूप से कार्यवाही के लिए व्यवस्था ही नहीं बनाई जाती है। इस कानून के साथ भी चार दिन की चांदनी रात, फिर वहीं अंधेरी रात वाली कहावत होती है और ऐसा भी नहीं है कि इस कानून को सख्ती से लागू नहीं किया जा सकता है। आपको सनद होगा पांच राज्यों के विधानसभा के चुनाव के दौरान चुनाव आयोग द्वारा दिल्ली में आचार संहिता लगा रखी थी। तब आपको किसी भी सरकारी संपत्ति आदि पर आपको पोस्टर्स /होडिग्स देखने को नहीं मिले होंगे। यदि कुछ होडिग्स लगे हुए थें वो संबंधित विभाग से अनुमति लेकर लगाये गये थें और इससे संबंधित विभाग को ‘राजस्व’ भी प्राप्त हुआ था। इस तथ्य को देखकर हम कह सकते हैं कि सुप्रीम कोर्ट, सरकार, दिल्ली हाईकोर्ट, निचली अदालतों, दिल्ली नगर निगम और दिल्ली पुलिस में कोई ताकत नहीं है या पूरी ईमानदारी से एक कानून का पालन करवाने की इच्छा शक्ति नहीं है. फिर क्यों ऐसे कानून बनाकर करोड़ों रूपये का फंड खराब किया जाता हैं. कानून बनाने से पहले उसको लागू करवाने की पूरी व्यवस्था बनानी चाहिए. दूसरे शब्दों में यह कहे कि जब  इनका कोई कहना ही कोई नहीं मानता है. तब क्यों हमें सिर्फ इस एक कानून को लागू करवाने की जिम्मेदारी "चुनाव आयोग" को सौंप देनी चाहिए. 
यदि हमारे देश के सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाईकोर्ट की एक-एक बेंच इस कानून का पालन करवाने के लिए स्वंय ‘संज्ञान’ लेकर अपने यहां पर और दिल्ली की एक-एक विधानसभा के हिसाब से निचली कोर्ट के एक-एक जज को नियुक्त करें या स्वंय संज्ञान लेकर हर रोज एक-एक घंटा अतिरिक्त समय देकर ऐसे मामलों को देशहित और समाजहित में शीघ्रता से निपटवाने की ऐसी व्यवस्था करें। जब तक हमारे देश के राजनीतिकों और उनके समर्थकों का आचारण सही नहीं होगा। तब तक अन्य लोग भी इस कानून का उल्लंघन करने से नहीं बचेंगे और दिल्ली सहित अन्य राज्य भी बदरंग होने से बच जायेेंगे।  
माननीय सुप्रीम कोर्ट- दिल्ली हाईकोर्ट- निचली कोर्ट के जज, दिल्ली नगर निगम और दिल्ली पुलिस के आयुक्त जी, मैंने एक ईमानदार पत्रकार होने के नाते अपना फर्ज पूरा कर दिया है. अब देखते हैं कि आप सभी "संज्ञान"लेकर उपरोक्त कानून को सख्ती से लागू करवाते हैं या फिर आप मात्र एक "जोकर" है. आपकी ईमानदारी को मेरी यह चुनौती है कि पूरे देश में केवल एक कानून पूरी ईमानदारी से लागू करवाकर दिखाएँ और आप केवल देश की आम जनता की कमाई खाने वाले अधिकारी नहीं है और आप एक "सैलरी" प्राप्त करने वाले एक सरकारी अधिकारी है. जो पूरी ईमानदारी से अपने पद की गरिमा बढ़ाते हुए अपने फर्ज को पूरा करते हैं.
 पाठकों, मुझे कागजों के टुकड़ेे एकत्रित करने का कोई शौंक नहीं है। अपनी मेहनत से कमाएँ धन को अहमियत जरुर देता हूँ। मगर बेईमानी या अनैतिक कार्यों से आये धन से मुझे कोई मोह नहीं है। बल्कि अच्छे कर्मों के मोती जोड़-जोड़कर माला पिरोना चाहता हूँ। मुझे तो केवल पेन्सिल बनकर आपके लिए ‘सुख’ लिखने की व रबड़ बनकर आपके ‘दुःख’ मिटाने की और दीपक बनकर आपके जीवन में रोशनी लाने की छोटी इच्छा है। यह मेरा आपसे वादा है। अपनी इस इच्छा के चलते बडे़ से बड़े त्याग और बलिदान करने से पीछे नहीं हटूंगा। एक बात याद रखना कि पेन्सिल और रबड़ खुद खत्म होकर भी हमें बहुत कुछ दे जाती है। इसके साथ ही दीपक (दिया) खुद जलकर दूसरों को रौशनी देता है। हमें अपना जीवन ऐसा ही बनाना चाहिए। जो दूसरों के किसी काम आ सकें तब ही यह जीवन सार्थक होगा।  
 
मैं आपके माध्यम से केवल इतना कहना चाहता हूं कि-अगर कोई भ्रष्ट व्यक्ति मेरी नेक-नियति से किये कार्यों के कारण मुझसे द्वेष-भावना रखते हुए मुझे अपने हाथों से जहर खिलाकर मरवाना चाहेगा। तब मैं बड़ी खुशी-खुशी से जहर भी खाने को तैयार हूं और मेरी मौत की आपको "सुपारी" देने की जरूरत नहीं. बस मेरी मौत का स्थान तुम निश्चित कर लो, समय और तारीख मैं खुद निश्चित करूँगा. आप मुझे जगह बताएं, मैं वहीँ आऊंगा मरने के लिए. मगर मुझे धोखा से न मारें, क्योंकि मुझे "पिंजरे में बंद तोते" से अपनी मौत की कोई जाँच नहीं करवानी हैं. मैं एक आजाद पंछी हूँ. आप केवल मेरा शरीर ही नष्ट कर सकते हो, मेरी आत्मा को नष्ट करना तो तुम्हारे बस की बात नहीं है. मैं देश और समाज को उन्नति की ओर लेकर जाना चाहता हूं। 
-आपका अपना निष्पक्ष और अपराध विरोधी पत्रकार रमेश कुमार "निर्भीक"

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मार्मिक अपील-सिर्फ एक फ़ोन की !

मैं इतना बड़ा पत्रकार तो नहीं हूँ मगर 15 साल की पत्रकारिता में मेरी ईमानदारी ही मेरी पूंजी है.आज ईमानदारी की सजा भी भुगत रहा हूँ.पैसों के पीछे भागती दुनिया में अब तक कलम का कोई सच्चा सिपाही नहीं मिला है.अगर संभव हो तो मेरा केस ईमानदारी से इंसानियत के नाते पढ़कर मेरी कोई मदद करें.पत्रकारों, वकीलों,पुलिस अधिकारीयों और जजों के रूखे व्यवहार से बहुत निराश हूँ.मेरे पास चाँदी के सिक्के नहीं है.मैंने कभी मात्र कागज के चंद टुकड़ों के लिए अपना ईमान व ज़मीर का सौदा नहीं किया.पत्रकारिता का एक अच्छा उद्देश्य था.15 साल की पत्रकारिता में ईमानदारी पर कभी कोई अंगुली नहीं उठी.लेकिन जब कोई अंगुली उठी तो दूषित मानसिकता वाली पत्नी ने उठाई.हमारे देश में महिलाओं के हितों बनाये कानून के दुरपयोग ने मुझे बिलकुल तोड़ दिया है.अब चारों से निराश हो चूका हूँ.आत्महत्या के सिवाए कोई चारा नजर नहीं आता है.प्लीज अगर कोई मदद कर सकते है तो जरुर करने की कोशिश करें...........आपका अहसानमंद रहूँगा. फाँसी का फंदा तैयार है, बस मौत का समय नहीं आया है. तलाश है कलम के सच्चे सिपाहियों की और ईमानदार सरकारी अधिकारीयों (जिनमें इंसानियत बची हो) की. विचार कीजियेगा:मृत पत्रकार पर तो कोई भी लेखनी चला सकता है.उसकी याद में या इंसाफ की पुकार के लिए कैंडल मार्च निकाल सकता है.घड़ियाली आंसू कोई भी बहा सकता है.क्या हमने कभी किसी जीवित पत्रकार की मदद की है,जब वो बगैर कसूर किये ही मुसीबत में हों?क्या तब भी हम पैसे लेकर ही अपने समाचार पत्र में खबर प्रकाशित करेंगे?अगर आपने अपना ज़मीर व ईमान नहीं बेचा हो, कलम को कोठे की वेश्या नहीं बनाया हो,कलम के उद्देश्य से वाफिक है और कलम से एक जान बचाने का पुण्य करना हो.तब आप इंसानियत के नाते बिंदापुर थानाध्यक्ष-ऋषिदेव(अब कार्यभार अतिरिक्त थानाध्यक्ष प्यारेलाल:09650254531) व सबइंस्पेक्टर-जितेद्र:9868921169 से मेरी शिकायत का डायरी नं.LC-2399/SHO-BP/दिनांक14-09-2010 और LC-2400/SHO-BP/दिनांक14-09-2010 आदि का जिक्र करते हुए केस की प्रगति की जानकारी हेतु एक फ़ोन जरुर कर दें.किसी प्रकार की अतिरिक्त जानकारी हेतु मुझे ईमेल या फ़ोन करें.धन्यबाद! आपका अपना रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा"

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