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रविवार, मई 15, 2011

पति द्वारा क्रूरता की धारा 498A में संशोधन हेतु सुझाव

अपने  कार्य  के  दौरान  विचार  करते  हुए
ज वैसे तो घटित अपराधों के किये जाने की शैली(आधुनिक व संचार माध्यमों द्वारा) को देखते हुए पूरे संविधान और कानूनों में संशोधन करने की आवश्यकता हैं.लेकिन सन-1983 में दहेज पर कानून में संशोधन करने के बाद एक तरफा धारा 498A के आस्तिव में आने के बाद से कुछ दूषित मानसिकता के लोगों द्वारा दुरूपयोग करने के मामले देखने व सुनने में आ रहे हैं.पिछले कई सालों से इन कानूनों के दुरूपयोग करें जाने पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा तल्ख़ टिप्पणी करने के बाद गृह मंत्रालय के निर्देश पर विधि आयोग इसमें संशोधन करने के लिए एक कमेटी का गठन किया गया और कमेटी ने आम जनता,गैर सरकारी संस्थाओं, संस्थानों और अधिवक्ता संघों से उनके विचार और सुझाव आमंत्रित किये हैं.इसी सन्दर्भ में अपने अनुभव और विचारों से अपने कुछ बहुमूल्य सुझाव दें रहा हूँ.पिछले दिनों बहुत ज्यादा ओनर किलिंग घटनाओं को देखते हुए और समाज में गिरती नैतिकता के चलते हुए आज समय की मांग को देखते हुए कम से कम "विवाह" नामक संस्था से जुड़े सभी कानून(304B, 406,494,125 आदि) की धाराओं मैं संशोधन की आवश्कता हैं और ठोस व सख्त कानून बनाने की आज बहुत ज्यादा आवश्कता है.
             मैंने अपने अनुभवों या जो समाज में देखा है या झेला है उसी के आधार पर कुछ बहुमूल्य सुझाव दिए हैं.हो सकता हैं कुछ क़ानूनी शब्दों का ज्ञान न होने या याद न आने के कारण से कुछ कमियां रह गई हो. अगर आपने भी अपने आस-पास देखा हो या आप या आपने अपने किसी रिश्तेदार को महिलाओं के हितों में बनाये कानूनों के दुरूपयोग पर परेशान देखकर कोई मन में इन कानून लेकर बदलाव हेतु कोई सुझाव आया हो तब आप भी बताये.अपने अनुभवों के आधार पर कह रहा हूँ कि-असली पीड़ित चाहे लड़का हो या लड़की हो,उसको कुव्यवस्थाओं के चलते न्याय नहीं मिल पता हैं.जिन अधिकारीयों के हाथ में इन कानूनों पर कार्यवाही करने की जिम्मेदारी होती हैं.वो सभी मात्र थोड़े से पैसों के लिए अपना ईमान व ज़मीर बेच देते हैं.इनमें खासतौर पर कुछ सरकारी वकील,पुलिस और जज शामिल होते हैं.इनके द्वारा कानूनों को तोड़-मोड़ देने से असली पीड़ित व्यक्ति की न्याय के प्रति आस्था कम होती जा रही हैं.आज कम से कम "विवाह" नामक संस्था को बचाने के लिए विधियिका को सख्त से सख्त कानून बनाने चाहिए. इसमें "मीडिया" को भी अपनी समाज के प्रति जिम्मेदारी को समझते हुए सही व्यक्ति की मदद करनी चाहिए.अब तक अक्सर देखा जा रहा है कि-जहाँ कोई बात महिला से जुड़ी घटना होती हैं.तब मीडिया उसका साथ देती हैं मगर पुरुष के मामले में उसका रवैया रुखा रहता है. 
अपने  विचारों को कलमबध्द करते  हुए
अपने अनुभवों से तैयार पति के नातेदारों द्वारा क्रूरता के विषय में दंड संबंधी भा.दं.संहिता की धारा 498A में संशोधन के सन्दर्भ में निम्नलिखित कुछ बहुमूल्य सुझावों को विधि आयोग में भेज रहा हूँ.जिसने भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के दुरुपयोग और उसे रोके जाने और प्रभावी बनाए जाने के लिए सुझाव आमंत्रित किए गए थे.
1 आई.पी.सी. धारा 498A में कुछ उपधारा जोड़ने की भी आवश्कता है.जिससे दोषी बच न सकें और निर्दोष सजा न पायें.
2 आई.पी.सी. धारा 498A के साथ ही सहायक आई.पी.सी.धारा 498B भी बनाये जाने की आवश्कता है और इसमें भी कुछ उपधारा होनी चाहिए.जिससे हमारे देश में दहेज प्रथा के साथ ही जाति, गौत्र और भेदभाव जैसी फैली बुराइयों को खत्म किया जा सकें.
                      लेकिन किसी भी कानून में बदलाव मात्र से समाज और पीड़ित व्यक्ति को लाभ नहीं मिल सकता हैं. जब तक व्यवस्थिका के साथ ही कार्यपालिका में उपरोक्त कानूनों को लेकर सख्त दिशा-निर्देश नहीं बनाये जाते हैं.तब तक इनमें किया बदलाव निर्थक होगा.
आई.पी.सी.धारा 498A में निम्नलिखित होना चाहिए.
1.अगर कोई पति-पत्नी अलग रहते हो तब उसके परिवार के अन्य सदस्यों को इसमें मात्र पति के रिश्तेदार होने की सजा नहीं दी जानी हैं यानि उनका नाम शामिल नहीं किया जाना चाहिए.
2.अगर कोई पति-पत्नी संयुक्त परिवार में रहते हैं.तब केस में ऐसे व्यक्तियों और महिलाओं का नाम शामिल नहीं होना चाहिए.जो खुद की देखभाल करने में सक्षम(गंभीर बीमार,चलने-फिरने के लायक न हो) न हो और नाबालिग बच्चों का नाम भी कहीं नहीं लिखा जाना चाहिए और खासतौर पर 14 साल से छोटे बच्चे का नाम बिलकुल भी नहीं हो चाहिए.बाकी सदस्यों का नाम पूरी जांच करके ही शामिल करने चाहिए.
3.उपरोक्त धारा में सजा और जुरमाना फ़िलहाल पर्याप्त है लेकिन इसका आरोप पत्र 180 दिनों में दाखिल किया जाना चाहिए. इन केसों का अंतिम फैसला अधिकतम पांच साल में हो जाना चाहिए यानि प्रथम सत्र, द्धितीय सत्र और तृतीय सत्र में आधिक से अधिक 18 महिने में फैसला होना चाहिए. जैसे-सत्र अदालत,हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट आदि.
4.ऐसे मामलों में महिला द्वारा पति का घर छोड़े हुई अंतिम तारीख से एक साल बीत जाने के बाद ही दोनों पक्षों को आवेदन करने पर तलाक मिल जाना चाहिए.मगर पति पर मामले की गंभीरता को देखते हुए उपरोक्त केस चलता रहना चाहिए.इससे दोनों पक्षों को नया जीवन जीने का मौका मिलना चाहिए.इससे वैवाहिक समस्यों के चलते होने वाली आत्महत्या की संख्या में काफी कमी आएगी.इस सन्दर्भ में विदेशों बनाये कानूनों को देखा जाना चाहिए.वहां पर वैवाहिक मामलों जल्दी से निपटारा हो जाता है.चाहे तलाक हो या अन्य(घरेलू हिंसा) कोई विवाद हो.
5.इसे मामलों में महिला अधिक से अधिक 90 दिनों में ही मामला दर्ज करवाएं.गर्भवती,शारीरिक(चोट लगी,जली हुई स्थिति में)और मानसिक रूप से बीमार(डाक्टर द्वारा घोषित-बोलने या अपना पक्ष रखने में असमर्थ)महिला अधिकतम पति का घर छोड़ने की अंतिम तारीख से एक साल में मामला दर्ज करवाएं.अक्सर होता यह है महिला के परिजन सौदेबाजी में लगे रहते हैं और मुंह मांगी रकम न मिलने पर ही केस दर्ज करवाते हैं.
6.सिर्फ ऐसे मामलों में अगर पति द्वारा महिला को शारीरिक (गुप्त अंगों पर काटना, जलाना, किसी वस्तु से गहरी चोट पहुंचा रखी हो) और मानसिक(कैद करके रखा हो, नशीली दवाइयां दी गई हो, वेश्यावृति अपनाने के लिए मजबूर किया हो, अश्लील फोटो या फिल्म बने हो और इन्टरनेट या संचार माध्यमों में प्रसारित की हो या अन्य कोई ऐसा आधुनिक तरीका जिससे उसका मानसिक संतुलन खराब हो जाता/गया हो)रूप से जख्मी किया हो. उनको तुरंत गिरफ्तार किया जाना चाहिए और उसको अग्रिमी जमानत नहीं मिलनी चाहिए.कई बार ऐसे अवसर आते हैं कि-पुरुष पत्रकार और सभ्य व्यक्ति पीड़ित की हालात भी नहीं देख सकता है. जैसे-वक्षों/जांघों पर काटना, योनि और नितम्बों को सिगरेट, लोहे के सरिया या चिमटे से जलाना आदि.इसलिए ऐसे मामलों को बहुत सख्ती से निपटने की आवश्कता है.
7.पति-पत्नी,परिजन,दोस्तों द्वारा महिला-पुरुष पर तेजाब फैंकवाने या महिला-पुरुष की बहन या भाई का अपहरण करना और उसकी बहन से या किसी महिला अन्य महिला से शादी करवाने के लिए मजबूर करवाना या अन्य महिलाओं से संबंध बनाना या उसे अपने साथ रखना,जानलेवा हमला करवाना और पहले से मौजूद आई.पी.सी.धारा 498A में अभिपेत-क में वर्णन नियम.
(क) जानबूझ कर किया गया कोई आचरण जो ऐसी प्रकृति का है जिस से उस स्त्री को आत्महत्या करने के लिए प्रेरित करने की या उस स्त्री के जीवन, अंग या स्वास्थ्य को (जो मानसिक हो या शारीरिक) गंभीर क्षति या खतरा कारित करने की संभावना है;या
8.घरेलू उपयोग में आने वाली चीजों की मांग पर या अपनी ख़ुशी से दिए जाने पर मामला दर्ज नहीं होना चाहिए.ऐसी वस्तुएं जो दोनों पति-पत्नी व बच्चों के प्रयोग में सहायक हो.कार, मोटर साईकिल आदि के साथ ही कीमती चीजें और पहले से मौजूद आई.पी.सी.धारा 498A में अभिपेत-ख में वर्णन नियम.
(ख) किसी स्त्री को इस दृष्टि से तंग करना कि उस को या उस के किसी नातेदार को किसी सम्पत्ति या मूल्यवान प्रतिभूति की कोई मांग पूरी करने के लिए उत्पीड़ित किया जाए या किसी स्त्री को इस कारण तंग करना कि उसका कोई नातेदार ऐसी मांग पूरी करने में असफल रहा है।
तिलक नगर में स्थित गुरुद्वारा में अरदास करते  हुए

9.वैवाहिक मामलों को पुलिस केस दर्ज करने से पहले पति व महिला के रहने के स्थान पर जाकर आस-पडोस, R.W.A और सामाजिक स्तर की छानबीन करनी चाहिए.ऐसी जांचें थानों में बैठकर नहीं होनी चाहिए.पुलिस का रवैया ऐसे मामलों में दोस्तना(कोई पेशेवर अपराधी नहीं है इसका खासतौर पर ध्यान रखना चाहिए) हो चाहिए.किसी सभ्य व्यक्ति का काम और समय बार-2 थाने में बुलाकर नष्ट न करें.किसी प्रकार की शिकायत या फैसले की प्रति दोनों को जारी करें.
10.वैवाहिक मामलों के लिए पुलिस में अलग विभाग हो.जैसे-अब वोमंस सैल है.मगर इसमें महिला-पुरुष को वैवाहिक जीवन को सुखमय चलने के लिए मनोचिकित्सक, क़ानूनी-वैवाहिक सलाहकारों की नियुक्ति होनी चाहिए.महिला-पुरुष की शिकायत पर दोनों पक्षों को सुना जाना चाहिए और श्रीमती किरण वेदी द्वारा अभिनीत कार्यक्रम "आपकी कचहरी"के फोर्मेट पर उनकी शिकायत पर की कार्यवाही की अपनाई गई पूरी प्रक्रिया की वीडियों फिल्म बननी चाहिए.किसी प्रकार की शिकायत या फैसले की प्रति दोनों को जारी करें.
11. सुझाव नं.6 में उल्लेखित क्रूरता(जो प्रथम दृष्टि में दिखाई देती है)को छोड़कर अगर जब तक ठोस सबूत न हो तब आरोपित व्यक्तियों को अग्रिमी जमानत दे देनी चाहिए.ऐसे मामलों में जज पक्षपात का व्यवहार न करें.
12.दहेज या घरेलू वस्तुएं दोनों पक्षों की सहमति से लिया-दिया जाता है.इसलिए उसकी सूची पर दोनों पक्षों के हस्ताक्षर होने चाहिए.यह न हो महिला पक्ष ने जो सामान दिया ही नहीं हो,उसको भी अपनी सूची में लिखवा दें और स्त्रीधन का निपटारा वोमंस सैल या मध्यस्थता में ही होना चाहिए.अगर महिला पक्ष स्त्रीधन पर नहीं मानता है.तब उनके पक्ष की आय के स्रोतों की जांच इनकम टैक्स विभाग द्वारा की जानी चाहिए.इससे शादी-विवाह में बहुत ज्यादा खर्च किया जा रहा काला धन पर रोक लगाईं जा सकती हैं.
13.जब तक किसी महिला को मानसिक व शारीरिक गंभीर चोट न लगी.तब उसको तलाक की एवज में किसी प्रकार का मुआवजा नहीं दिलवाना चाहिए.कई बार ऐसा होता है कि-महिला की जबरदस्ती शादी कर दी जाती हैं या यह कहे उनके किसी से प्रेम संबंध होते हैं.तब उपरोक्त महिला झूठे आधार तैयार करती हैं और इससे साजिश रचकर शादी करने वाली महिला और माता-पिता पर रोक लग सकेंगी.
 अपनी  पत्रिका  की  प्रचार  सामग्री  वितरण करते  हुए
   अगर इन उपायों का प्रयोग किया जाता है. तब "विवाह" नामक संस्था पर लोगों का विश्वास कायम होने के साथ ही महिला के ऊपर किये जा रहे अत्याचारों पर रोक लग जाएँगी और कोई दोषी बचेगा नहीं और निर्दोष व्यक्ति शोषित नहीं होगा.इससे असली पीड़ित महिला को न्याय मिलेगा और न्यायलयों में फर्जी केसों का बोझ नहीं बढेगा.ऐसा मुझे विश्वास है.
आई.पी.सी.धारा498B में निम्नलिखित होना चाहिए.
1.विशेष विवाह अधिनियम 1954 या किसी प्रकार का कोर्ट मैरिज या आर्य समाज मन्दिर में शादी के अंतर्गत विवाहित जोड़ों को सरकार घरेलू सामान के लिए या वैवाहिक जीवन को सुखमय बनाने के लिए पूरी सुरक्षा के साथ ही एक लाख रूपये की राशि दहेज प्रथा,जाति,धर्म का भेदभाव को मिटाने   में योगदान देने के एवज में सहायता के रूप में उपलब्ध करवाएं और उनके विवाहित जीवन पर सामाजिक स्तर या थाना स्तर पर नजर रखें.कहीं ऐसा न हो कि-पैसों के लालच में इसका दुरूपयोग न कोई करें.  
2.विशेष विवाह अधिनियम 1954 या किसी प्रकार का कोर्ट मैरिज या आर्य समाज मन्दिर में शादी के अंतर्गत विवाहित जोड़ों के वैवाहिक जीवन में महिला के परिजनों द्वारा दखलांदाजी करने पर या वैवाहिक जीवन को तनाव पूर्ण बनाने के लिए किये जाने वाले ऐसे कार्यों के लिए धारा 498A में दर्ज सजा और जुरमाना लागू होना चाहिए.
3.विशेष विवाह अधिनियम 1954 या किसी प्रकार का कोर्ट मैरिज या आर्य समाज मन्दिर में शादी के अंतर्गत विवाहित जोड़ों के वैवाहिक जीवन में अगर स्वंय महिला या अपने परिजनों व किसी के बहकाने पर वैवाहिक जीवन को तनाव पूर्ण बनाती है या अपनी जिम्मेदारियों और दायित्व का पालन नहीं करती हैं या किसी अनैतिक संबंध कायम करने का कार्य करती हैं.तब ऐसे कार्यों के लिए धारा 498A में दर्ज सजा और जुरमाना लागू होना चाहिए और साथ में पति का कैरियर चौपड़ करने,प्रतिष्टा धूमिल करने और न्याय प्रक्रिया का समय ख़राब करने के जुर्म में कम से कम पांच लाख का जुरमाना लिया जाना चाहिए.इसका कुछ भाग पीड़ित पक्ष की स्थिति को देखते हुए दिया जाना चाहिए.
4.विशेष विवाह अधिनियम 1954 या किसी प्रकार का कोर्ट मैरिज या आर्य समाज मन्दिर में शादी के अंतर्गत मामलों में पति द्वारा पत्नी या अपने सुसरालियों की पुलिस में की गई शिकायत पर जल्दी कार्यवाही होनी चाहिए और फैसले की कापी दोनों को दी जानी चाहिए और पति के शादी के पहले 7 सालों में वैवाहिक कारणों से आत्महत्या करने के सन्दर्भ में पत्नी और उसके परिजनों के खिलाफ केस दायर करना सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए और इसमें पति के परिजनों को सरकारी सहयता के रूप में मुआवजा दिलवाने के साथ ही अपने खर्च पर सरकारी वकील या वकील की फ़ीस आदि की व्यवस्था करें.  
5.विशेष विवाह अधिनियम 1954 या किसी प्रकार का कोर्ट मैरिज या आर्य समाज मन्दिर में जो पति-पत्नी बच्चों को अपने साथ या पास रखेगा. उसका पालन-पोषण उसकी जिम्मेदारी होगी.उसको दूसरे व्यक्ति से मुआवजा मांगने का हक़ नहीं होगा.किसी मामले में पिता-माता नशेडी या अपराधिक प्रवृति का हो और माँ-पिता किन्ही कारणों से कमाने में असमर्थ हो.तब दूसरे पक्ष की पालन-पोषण की जिम्मेदारी होगी.
कानून के दुरूपयोग से सभ्य व्यक्ति रूप बदलकर रहने को मजबूर
 अगर इन उपायों का प्रयोग किया जाता है. तब "विवाह" नामक संस्था पर लोगों का विश्वास कायम होने के साथ ही पुरुष के ऊपर किये जा रहे अत्याचारों पर रोक लग जाएँगी और कोई दोषी बचेगा नहीं और निर्दोष व्यक्ति शोषित नहीं होगा. इससे असली पीड़ित पुरुष को न्याय मिलेगा और न्यायलयों में फर्जी केसों का बोझ नहीं बढेगा.ऐसा मुझे विश्वास है.

शनिवार, मई 14, 2011

कोशिश करें-तब ब्लाग भी "मीडिया" बन सकता है


अपने चुनाव चिन्ह "कैमरा"के साथ सिरफिरा 
देश में लगभग 6 करोड़ लोग हैं.जो नियमित इंटरनेट का उपयोग करते हैं. देश की कुल जनसंख्या के लिहाज से यह संख्या कुछ खास नहीं है, लेकिन संसाधनों की उपलब्धता को देखें तो यह संख्या कम भी नहीं है. छह करोड़ लोगों की इस संख्या में दिन दूनी रात-चौगुनी बढ़ोत्तरी भी हो रही है. ऐसे समय में ब्लॉग का जन्म और प्रसार वैकल्पिक मीडिया की तलाश में लगे लोगों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है. कुछ लोगों की मेहनत, समझ और सूझबूझ का परिणाम है कि-यह तकनीकि रूप से लगातार और अधिक सक्षम और कारगर होता जा रहा है.
                     एक बात पक्की है कि जिस वैकल्पिक मीडिया की बात हम लोग करते आ रहे थे, वह यही है. जहां अभिव्यक्ति की इतनी अधिक स्वतंत्रता है कि-आप गाली-गलौज भी कर सकते हैं. लेकिन क्या हमें इस स्वतंत्रता का दुरूपयोग करना चाहिए या फिर सचमुच हमारे पास हिन्दी में लिखने के लिए कुछ ऐसा है ही नहीं,  जो समूह के हित के लिए हम लिख सकें? आमतौर पर हम इस माध्यम को अपनी कला, हुनर, बुद्धि, भड़ास आदि निकालने के लिए कर रहे हैं. पितामह ब्लागरों से लेकर नये-नवेले ब्लागरों तक एक बात साफ तौर पर दिखती है कि शुरूआत जहां से होती है वहां से सीढ़ी उत्थान की ओर नहीं पतन की ओर घूम जाती है. यह छीजन अनर्थकारी है.

                    ब्लाग की दुनिया में कुछ अपवादों को छोड़ दें तो अव्वल तो हम सूचना के बारे में जानते ही नहीं है. जिन सूचनाओं से हम अपनी विद्वता का सबूत देते हैं वे मूलतः टीवी, अखबार और इंटरनेट की जूठन होती है.यानि हम भी उसी खेल के हिस्से होकर रह जाते हैं. जिनके आतंक से बाहर आने के लिए हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे भारी-भरकम शब्दों की माला जपते हैं. देश के कुछ अखबार और टीवी चैनल खबरों की परिभाषा बदलने में लगे हुए हैं. यह उनकी समझ और मजबूरी हो सकती है, हमारे सामने क्या मजबूरी है? कोई मजबूरी नहीं दिखती. यह तो शुद्धरूप से हमारी समझ है कि-हम इस वैकल्पिक मीडिया का क्या उपयोग कर रहे हैं?
          हिंदी ब्लाग दुनिया खंगालने के बाद कुछ ब्लाग ऐसे दिखते हैं, जिनमें काम की जानकारी होती है. ज्यादातर अपनी भड़ास निकालते हैं. गुस्सा है तो जरूर निकालिए. लेकिन उसको कोई तार्किक रूप दीजिए. उसका कोई आधार बनाईये. आप गुस्सा हैं इसमें दो राय नहीं, लेकिन आपके गुस्से से मैं भला क्यों गुस्सा हो जाऊं? लिखनेवाले वाले का धर्म है कि वह अपने गुस्से को पी जाए. वह गुस्सा उसके लिखने में ऐसे उतर आये कि पढ़ने वाले की भौंहे तन जाए. इसके साथ ही एक काम और करना चाहिए. अपने आस-पास ऐसे बहुत से लोग होते हैं,  जिन्हें ब्लाग का रास्ता दिखाया जा सकता है. 
             मैं इस दुनिया में कुल नौ महीने पुराना हूं. मैंने अब तक दो लोगों को ब्लाग बनाने और चलाने के लिए प्रेरित किया है, कई लोगों को अपनी पोस्टों द्वारा देवनागरी की हिंदी लिपि लिखनी सिखाने में मदद की. मैंने अनेक लोगों को छोटी-मोटी जानकारी फ़ोन पर भी दी.इसलिए मैंने अपने फ़ोन नं. भी ब्लॉग पर दे रखे हैं, क्योंकि मेरा विचार है कि-जिस प्रकार मुझे शुरुयात जानकारी न होने से परेशानी हुई थी. अगर किसी को कोई परेशानी हो तो जितनी भी मुझे जानकारी हो दे सकूँ. आज वे दोनों आज ब्लाग की दुनिया में शामिल हो चुके हैं. मुझे लगता है कि अगर हम ऐसे दो-चार लोगों को जोड़ सकें. जो आगे भी दो-चार लोगों को जोड़ने की क्षमता रखते हैं तो परिणाम आशातीत आयेंगे.आप बताईये अपने-आप को कौन अभिव्यक्त नहीं करना चाहेगा. शुरूआत में कुछ ब्लागर मित्रों ने मुझे प्रोत्साहित न किया होता, मेरी तकनीकि तौर पर मदद न की होती और अभी भी कर रहे हैं. एक बार मैं भी जैसे-तैसे घूमते-फिरते यहां पहुंचा था. वैसे ही टहलते-घूमते बाहर चला जाता. उन्हीं मित्रों के सहयोग का परिणाम है कि मैं यहां टिक गया और ब्लाग में मुझे वैकल्पिक मीडिया नजर आने लगा है.
                    टी.वी. ने खबरों के साथ जैसा मजाक किया है, उससे खबर की परिभाषा पर ही सवाल खड़ा हो गया है. मैं कहीं से यह मानने के लिए तैयार नहीं हूं कि टी.वी. और पत्रकारिता का कोई संबंध है. हमें किसी से ज्यादा गहराई की उम्मीद नहीं करनी चाहिए. लेकिन यह भी नहीं हो सकता कि-कोई इतना हल्का हो जाए कि उसके होने-न-होने का मतलब ही समाप्त हो जाए. टीआरपी के लिए टी.वी.चैनल खोलते हैं. यह टी.आर.पी जो संस्थाएं तय करती हैं, वे उन्हीं व्यावसायिक घरानों के दिमाग की उपज हैं. जो प्रत्यक्ष तौर पर मनुष्य का शोषण करती हैं. इस लिहाज से टी.वी. चैनल भी परोक्ष रूप से जनता के शोषण के हथियार हैं, वैसे ही जैसे ज्यादातर बड़े अखबार. ये प्रसार माध्यम हैं जो विकृत होकर कंपनियों और रसूखवाले लोगों की गतिविधियों को समाचार बनाकर परोस रहे हैं.

          ब्लागर इसमें हस्तक्षेप कर सकते हैं. खबर की परिभाषा ठीक बनाए रखना है, तब हमें यह करना भी चाहिए. नहीं तो कल जब ब्लागरों की दुनिया इतनी बड़ी हो जाएगी कि- इसका ओर-छोर नहीं होगा. तब यह कमी दंश के रूप में चुभेगी कि-काश उस समय सोच लिया होता, दुर्भाग्य से तब हम समय के बहुत आगे निकल चुके होंगे. हमारी समझ ब्लागजगत का सीमांकन कर चुका होगा और हम खुद को ही छला हुआ महसूस करेंगे. (क्रमश:)  (लेख का कुछ भाग संकलन किया हुआ है इसका सन्दर्भ फ़िलहाल याद नहीं है, मगर लेख का उद्देश्य जनहित है)

शनिवार, मई 07, 2011

क्या ब्लॉगर मेरी थोड़ी मदद कर सकते हैं

अक्सर मिलने वोली धमकियों से परेशान
 सन  2008 में तख्ती पहनकर घूमता सिरफिरा 
हमारे देश का हर दूसरा नागरिक यह सोचता है कि-भारत में शहीद भगत सिंह, नेताजी सुभाष  चन्द्र बोस आदि नौजवान पैदा हो, मगर हमारे घर में नहीं. आखिर क्यों नहीं करना चाहते/चाहती पैदा ऐसे नौजवानों को?
 ज भ्रष्टाचार की शिकायत करने पर आपके सारे काम रोक दिए जाते हैं और आपका सारे भ्रष्टाचारी एकत्रित होकर आपका शोषण करने लग जाते हैं. ऐसा मेरा अनुभव है, अभी 5 मई 2011 को तीस हजारी की लीगल सैल में मेरे साथ बुरा बर्ताव हुआ और सरकारी वकील ने जान से मारने की धमकी पूरे स्टाफ के सामने दी थीं, क्योंकि इन दिनों बीमार चल रहा हूँ. इसलिए फ़िलहाल इसकी उच्च स्तर पर शिकायत करने में असमर्थ हूँ. लेकिन भ्रष्टाचारियों के हाथों मरने से पहले 10-20 भ्रष्टों को लेकर जरुर मरूँगा. आप सभी को यह मेरा वादा है. सरकारी वकील की शिकायत क्यों करनी पड़ी इसको देखने के लिए उसका लिंक  प्यार करने वाले जीते हैं शान से, मरते हैं शान से  देखे.

अगर मुझे थोडा-सा साथ(धर्म और जाति से ऊपर उठकर  "इंसानियत " के फर्ज के चलते ब्लॉगर भाइयों का ही) और तकनीकी जानकारी  मिल जाए तो मैं इन भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने के साथ ही अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार हूँ क्योंकि अपने 17 वर्षीय पत्रकारिता के अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ कि-अब प्रिंट व इलेक्टोनिक्स मीडिया में अब वो दम नहीं रहा. जो उनकी पत्रकारिता में पहले हुआ करता हैं. लोकतंत्र के तीनों स्तंभ के साथ-साथ चौथे स्तंभ का भी नैतिक पतन हो चुका है. पहले पत्रकारिता एक जन आन्दोलन हुआ करती थीं. अब चमक-दमक के साथ भौतिक सुखों की पूर्ति का साधन बन चुकी है. यानि पत्रकारिता उद्देश्यहीन होती जा रही है. 
श्री हजारे का अपने क्षेत्र में प्रचार 

5 अप्रैल को श्री अन्ना हजारे जी ने जन्तर-मन्तर पर बताया था कि-मैंने अपनी 26 वर्ष की आयु में ही सोच लिया था. ख़ाली हाथ आया और ख़ाली हाथ ही जाऊंगा. फिर उसके बाद से आज तक भ्रष्टाचारियों के खिलाफ लड़ रहा हूँ. मैंने यह ही बातें सोचकर अपनी 20 वर्ष की आयु से अपनी कलम और अपने प्रकाशन के माध्यम से भ्रष्टाचारियों  से लड़ता रहा हूँ. 

आज मेरी पत्नी और सुसराल वालों द्वारा दर्ज धारा-498A और 406 के साथ ही धारा 125 के कारणों से आर्थिक और शरीरिक के साथ ही मानसिक स्थिति ठीक नहीं है. जो पत्नी(अर्धगनी कहलती हैं यानि आधे दुखों को हरने वाली, मगर मेरे दो गुणा बढ़ा दिए ) के फर्जी केसों से थोडा-सा टूट जरुर गया हूँ. अगर कुछ अलग-अलग शहरों के ब्लॉगर थोड़ी-थोड़ी मदद(रूपये और पैसों की नहीं, तकनीकी जानकारी और "सूचना का अधिकार" के तहत आवेदन करने के लिए अपना नाम और पता का प्रयोग करें. मैं आवेदन पत्र पर आने वाला खर्च स्वंय वहन करूँगा. अपने यहाँ से तैयार करके आपको कोरियर से भेज दूंगा और आपको कोरियर मिलते ही बस भारतीय डाक सेवा की स्पीड पोस्ट से उसमें लिखे पते पर मात्र भेजना होगा) कर दें. तब फर्जी केसों से और अपनी दो सालों से चली आ रही डिप्रेशन की बीमारी से उबर सकता हूँ. उसके बाद भ्रष्टाचारियों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई में फाँसी का फंदा चूमने के लिए भी हमेशा तैयार रहूँगा.

मंगलवार, मई 03, 2011

आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें

म ब्लोगिंग जगत के "अजन्मे बच्चे"( अभी तो अजन्मा बच्चा हूँ मेरे दोस्तों !) हैं और ब्लोगिंग जगत का अनपढ़, ग्वार यह नाचीज़ इंसान का अभी जन्म ही नहीं हुआ है. अभी हम ब्लोगिंग जगत का क.ख.ग सिखने की कोशिश कर रहा हूँ. इसलिए मेरे लिए खासतौर पर देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को रोमन लिपि में या अंग्रेजी में लिखी गयी टिप्‍पणी पढना मुश्किल कार्य है, इसलिए जिस पोस्‍ट में भी देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को रोमन लिपि में या अंग्रेजी  में टिप्‍पणी होती हैं. मैं उसको पढता ही नहीं. हाँ, कभी-२ मेरी पोस्‍ट पर होती है.उसे कैसे न कैसे करके पढता हूँ.जब कभी-२ समय होता है तब उसका देवनागरी की मूल हिंदी लिपि में अनुवाद भी कर देता हूँ.  इसको दूसरों को भी पढ़ने में कठिनाई होती है.
                   इस बात को सभी ब्लोग्गरों को भी समझना चाहिए। जब आपके विचारों और भावनाओं को कोई समझ ही नहीं पाता है. तब अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने का क्या फायदा. मुझे बार-बार गूगल transliteration पर जाकर देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को टाईप करना पड़ता है. फिर कापी पेस्ट करता हूँ. मुझे इसी सुविधा की आदत है. बहुत से ब्लॉग पर "हिंदी वर्जन का विजेट " लगा हुआ होता है लेकिन हर ब्लॉग पर ज्यादात्तर नही होता. तब कापी पेस्ट करने में टाईम बहुत लगता है. मगर मै ज्यादात्तर देवनागरी की मूल हिंदी लिपि में ही टिप्पणी करता हूँ.कभी-कभी समय न होने की वजय से ही ज्यादा से ज्यादा 11शब्दों की टिप्पणी रोमन लिपि में करता हूँ. अगर कोई  ओर तरीका हो तो मुझे अवश्य बताए, क्योंकि ऐसा तब ही संभव हो पाता है. जब इन्टरनेट पर नेटवर्क सही से आ रहा हो.
           मै खुद को देवनागरी की मूल हिंदी लिपि में ही सहज(अपने विचारों और भावनाओं को व्यक्त करने में) समझता हूँ. मै चाहता हूँ कि-सब ब्लॉगर अपने-अपने ब्लोगों पर 'हिंदी वाला विजेट' अपने ब्लॉग पर लगाए और तकनीकी ज्ञाता मुझे मेरे ब्लोगों पर लगाने में मदद करें. मुझे देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को रोमन लिपि में या अंग्रेजी में लिखी टिप्पणी पढने में असुविधा होती है.बहुत ज़रूरी ना हो तो मैं भी पढने से टालने की कोशिश करता हूँ. मेरे कंप्यूटर का कीबोर्ड अंग्रेजी में है, किन्तु देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को साफ्टवेयर(गूगल transliteration) में टाईप करके टिप्पणीयां पेस्ट करता हूँ. मै हर संभव कोशिश करता हूँ कि-टिप्पणी देवनागरी की मूल हिंदी लिपि में हो, जब मुझे खुद दूसरो द्वारा देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को रोमन लिपि में या अंग्रेजी में की गयी टिप्पणिया पढने में परेशानी होती है. फिर दूसरों को कितनी दिक्कत होती होगी?  मुझे दूसरो द्वारा देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को रोमन लिपि में या अंग्रेजी में की गयी टिप्पणिया सुहाती ही नहीं है. यह मेरे दिल के यही ज्जबात है बल्कि किसी का कोई अपमान करने का कोई उद्देश्य नहीं है. क्या हम अंग्रेजी का ज्यादा से ज्यादा प्रयोग करके अपने को ज्यादा पढ़ा-लिखा होने का दिखावा नहीं करते हैं? किसलिए और किसके लिए इतना दिखावा? 
              मुझे कभी-कभी देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को रोमन लिपि में या अंग्रेजी में टिप्पणिया व्यावहारिक(कुछ व्यक्ति हिंदी लिपि में विचारों और भावनाओं को समझने में असमर्थ होते हैं) समस्यायों के चलते करनी पड़ती है.जैसे-मोबाईल पर संदेश आदि. वैसे ज्यादात्तर मोबाईल पर संदेश हिंदी लिपि की रोमन लिपि में ही भेजता हूँ. मुझे हिन्दी लिपि के ब्लॉग पर हिन्दी लिपि में ही टिप्पणी अच्छी लगती है और हिंदी लिपि को ही पढने में आनंद आता है. हमारी कथनी और करनी में स्वार्थी राजनीतिकों जैसा फर्क नहीं होना चाहिए.
           आज मेरे प्रकाशन परिवार में सबसे ज्यादा हिंदी लिपि की पत्र-पत्रिकाएँ, लेटर पैड, बिलबुक, प्रचार सामग्री, विजिटिंग कार्ड, मेरे समाचार पत्रों को रजिस्टर्ड करने की कार्यवाही के फॉर्म, शपथ पत्र, समाचार पत्रों के पंजीकरण प्रमाण पत्र आदि, विज्ञापन रेट कार्ड व बुकिंग फॉर्म, रबड़ की मोहरें, समाचारों पत्रों में हिंदी लिपि के विज्ञापन के रेट कम है और अंग्रेजी के ज्यादा है और सबसे ज्यादा हिंदी लिपि में विज्ञापन प्रकाशित हुए है. अपने क्षेत्र से दो बार चुनाव लड़ने की प्रक्रिया के फॉर्म, शपथ पत्र आदि सब हिंदी लिपि में भर कर दे चूका हूँ.  इसके साथ ही अनेकों ऐसी सामग्री भी हिंदी लिपि में है. जो किसी तक अपने विचार और भावना समझाने में सहायक होती है. 

       इन्टरनेट की दुनिया में जनवरी 2010 में प्रवेश करने के मात्र सात-आठ महीने की मेहनत से ही अपनी ईमेल, ब्लॉग, ऑरकुट और फेसबुक की प्रोफाइल आदि की सभी सैटिंग हिंदी लिपि में  ही कर रखी है.ऑरकुट और फेसबुक पर "रमेश कुमार सिरफिरा(Ramesh Kumar Sirfiraa" के नाम से मौजूद हूँ. आज तक लगभग 992 लोगों को ईमेल हिंदी लिपि में भेज चुका हूँ और  अनेकों ब्लोगों पर लगभग 1100  टिप्पणी हिंदी लिपि में कर चुका हूँ. अपने ब्लोगों पर लगभग 20000 शब्दों को हिंदी लिपि में लिख चुका हूँ. अपने  उपरोक्त ब्लॉग  पर  अन्य  व्यक्तियों  को  हिंदी लिपि सिखाने के उद्देश्य से दो पोस्ट हिंदी की टाइपिंग कैसे करें  और  हिंदी में ईमेल कैसे भेजें. पोस्ट  भी  लिखी  थीं. 
         अपनी पत्नी के डाले फर्जी केसों से संबंधित लगभग 20000 शब्द हिंदी लिपि में लिखकर न्याय व्यवस्था के अधिकारियों को लिखकर दे चुका हूँ और आने वाले दो महीनों में लगभग 20000 शब्द हिंदी लिपि में लिखकर देने वाला हूँ. इसके अलावा जब से मेरे ऊपर फर्जी केस दर्ज हुए तब से पत्नी को समझने के उद्देश्य से लगभग 20000 शब्द हिंदी लिपि में बोल चुका हूँ.
           प्रेम विवाह होने से पहले अपनी पत्नी को लगभग 2000 शब्द
हिंदी लिपि लिखकर दे चुका था और लगभग 20000 शब्दों का उच्चारण हिंदी लिपि में कर चुका हूँ.  इसके साथ ही मेरे ऊपर फर्जी केस दर्ज  होने के बाद से हिंदी लिपि के लगभग 200000  क़ानूनी शब्दों को ब्लॉग पर और लगभग 200000 क़ानूनी शब्द अखवार और मैगजींस में पढ़ चुका हूँ.इसके साथ ही हिंदी लिपि के टी.वी चैनलों पर धारा 498A और 406 की चर्चाओं(बहस आदि) में लगभग 200000शब्द और अपने दोस्तों/रिश्तेदारों से उलाने(ताने) के रूप में लगभग 20000 शब्द अपने कानों से सुन चुका हूँ. 
        इसके अलावा सबसे महत्वपूर्ण बात अपने मात्र साढ़े तीन साल के वैवाहिक जीवन में अपनी पत्नी और सुसराल वालों से लगभग 200000अपशब्द हिंदी लिपि के और 200 अंग्रेजी में सुन चुका हूँ.अब तक लगभग दो करोड़ शब्द हिंदी लिपि के अपनी पत्रकारिता(समाचार पत्र-पत्रिकाओं में) के चलते लिख चुका हूँ और प्रकाशित हो चुके हैं. लगभग दो लाख शब्द हिंदी लिपि के कुव्यवस्था  के चलते शिकायती पत्रों में लिख चुका हूँ और अन्य व्यक्तियों की मदद करने के उद्देश्य से लगभग दो लाख शब्द हिंदी लिपि के उनके शिकायती पत्र और किसी कार्य से जुड़े फोरमों में लिख चुका हूँ. अर्थात पढ़ता हिंदी लिपि हूँ. लिखता हिंदी लिपि हूँ. सुनता हिंदी लिपि हूँ. खाता हिंदी लिपि हूँ, पहनता हिंदी लिपि  हूँ और बोलता भी हिंदी लिपि में हूँ. मुझे इस पर गर्व है कि-मुझे अंग्रेजी नहीं आती है. 
               एक बार आप भी गर्व से कहों हम सच्चे भारतीय है. हिंदी लिपि को लेकर आज मुझ में एक ही कमी है कि 10-11दिन पहले ही एक दोस्त ने मुझे इन्टरनेट पर चैटिंग(वार्तालाप, बातचीत) करनी सिखाई है, वो  मुझे जानकारी न होने की वजह से देवनागरी की मूल हिंदी लिपि को रोमन लिपि में लिखनी पड़ती हैं. जानकारी प्राप्त होते ही हिंदी लिपि  में बातचीत शुरू कर दूंगा. ऐसा मेरा दृढ संकल्प है.  
आज सभी हिंदी ब्लॉगर भाई यह शपथ लें
आज सभी हिंदी लिपि ब्लॉगर भाई यह शपथ लें कि-हम आज के बाद  हिंदी लिपि और अन्य लिपियों के ब्लोगों को पढने के बाद भी अपनी टिप्पणी हिंदी लिपि में ही करूँगा और हिंदी लिपि ब्लोगिंग जगत को उंचाईयों पर पहुँचाने के लिए हिंदी लिपि के प्रति ईमानदार बना रहूँगा.अपने ब्लॉग का नाम (शीर्षक) हिंदी लिपि में लिखूँगा. जय हिंद!   
नोट : दोस्तों, मैंने अब इनस्क्रिप्ट के माध्यम से  देवनागरी की लिपि द्वारा हिंदी लिखना सीख लिया है.   
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मार्मिक अपील-सिर्फ एक फ़ोन की !

मैं इतना बड़ा पत्रकार तो नहीं हूँ मगर 15 साल की पत्रकारिता में मेरी ईमानदारी ही मेरी पूंजी है.आज ईमानदारी की सजा भी भुगत रहा हूँ.पैसों के पीछे भागती दुनिया में अब तक कलम का कोई सच्चा सिपाही नहीं मिला है.अगर संभव हो तो मेरा केस ईमानदारी से इंसानियत के नाते पढ़कर मेरी कोई मदद करें.पत्रकारों, वकीलों,पुलिस अधिकारीयों और जजों के रूखे व्यवहार से बहुत निराश हूँ.मेरे पास चाँदी के सिक्के नहीं है.मैंने कभी मात्र कागज के चंद टुकड़ों के लिए अपना ईमान व ज़मीर का सौदा नहीं किया.पत्रकारिता का एक अच्छा उद्देश्य था.15 साल की पत्रकारिता में ईमानदारी पर कभी कोई अंगुली नहीं उठी.लेकिन जब कोई अंगुली उठी तो दूषित मानसिकता वाली पत्नी ने उठाई.हमारे देश में महिलाओं के हितों बनाये कानून के दुरपयोग ने मुझे बिलकुल तोड़ दिया है.अब चारों से निराश हो चूका हूँ.आत्महत्या के सिवाए कोई चारा नजर नहीं आता है.प्लीज अगर कोई मदद कर सकते है तो जरुर करने की कोशिश करें...........आपका अहसानमंद रहूँगा. फाँसी का फंदा तैयार है, बस मौत का समय नहीं आया है. तलाश है कलम के सच्चे सिपाहियों की और ईमानदार सरकारी अधिकारीयों (जिनमें इंसानियत बची हो) की. विचार कीजियेगा:मृत पत्रकार पर तो कोई भी लेखनी चला सकता है.उसकी याद में या इंसाफ की पुकार के लिए कैंडल मार्च निकाल सकता है.घड़ियाली आंसू कोई भी बहा सकता है.क्या हमने कभी किसी जीवित पत्रकार की मदद की है,जब वो बगैर कसूर किये ही मुसीबत में हों?क्या तब भी हम पैसे लेकर ही अपने समाचार पत्र में खबर प्रकाशित करेंगे?अगर आपने अपना ज़मीर व ईमान नहीं बेचा हो, कलम को कोठे की वेश्या नहीं बनाया हो,कलम के उद्देश्य से वाफिक है और कलम से एक जान बचाने का पुण्य करना हो.तब आप इंसानियत के नाते बिंदापुर थानाध्यक्ष-ऋषिदेव(अब कार्यभार अतिरिक्त थानाध्यक्ष प्यारेलाल:09650254531) व सबइंस्पेक्टर-जितेद्र:9868921169 से मेरी शिकायत का डायरी नं.LC-2399/SHO-BP/दिनांक14-09-2010 और LC-2400/SHO-BP/दिनांक14-09-2010 आदि का जिक्र करते हुए केस की प्रगति की जानकारी हेतु एक फ़ोन जरुर कर दें.किसी प्रकार की अतिरिक्त जानकारी हेतु मुझे ईमेल या फ़ोन करें.धन्यबाद! आपका अपना रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा"

क्या आप कॉमनवेल्थ खेलों की वजह से अपने कर्त्यवों को पूरा नहीं करेंगे? कॉमनवेल्थ खेलों की वजह से अधिकारियों को स्टेडियम जाना पड़ता है और थाने में सी.डी सुनने की सुविधा नहीं हैं तो क्या FIR दर्ज नहीं होगी? एक शिकायत पर जांच करने में कितना समय लगता है/लगेगा? चौबीस दिन होने के बाद भी जांच नहीं हुई तो कितने दिन बाद जांच होगी?



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