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रविवार, जून 12, 2011

मेरी शिकायत उनकी ईमानदारी पर एक प्रश्नचिन्ह है.

मैंने अपनी पिछली पोस्ट क्या ब्लॉगर मेरी थोड़ी मदद कर सकते हैं  में लिखा था कि ब्लोगर अगर मुझे थोडा-सा साथ(धर्म और जाति से ऊपर उठकर"इंसानियत" के फर्ज के चलते ब्लॉगर भाइयों का ही)और तकनीकी जानकारी मिल जाए तो मैं इन भ्रष्टाचारियों को बेनकाब करने के साथ ही अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार हूँ और ज भ्रष्टाचार की शिकायत करने पर आपके सारे काम रोक दिए जाते हैं और आपका सारे भ्रष्टाचारी एकत्रित होकर आपका शोषण करने लग जाते हैं. ऐसा मेरा अनुभव है, अभी 5 मई 2011 को तीस हजारी की लीगल सैल में मेरे साथ बुरा बर्ताव किया था और सरकारी वकील ने जान से मारने की धमकी पूरे स्टाफ के सामने दी थीं, क्योंकि काफी दिनों बीमार चल रहा हूँ. इसलिए उसकी उच्च स्तर पर शिकायत करने में असमर्थ था. मगर मैंने लिखा था कि  भ्रष्टाचारियों के हाथों मरने से पहले 10-20 भ्रष्टों को लेकर जरुर मरूँगा. आप सभी को यह मेरा वादा है. सरकारी वकील की शिकायत क्यों करनी पड़ी इसको देखने के लिए उसका लिंक  प्यार करने वाले जीते हैं शान से, मरते हैं शान से  देखे.अब देखते हैं जैसे कल देश की आर्थिक राजधानी मुम्बई में खोजी पत्रकारिता का सर्वनाम बन चुके मिड डे अखबार के वरिष्ठ अख़बारनवीस को उपनगरीय पवई के हीरानन्दानी इलाके में अपनी निर्भीक और बेबाक ख़बरों के लिए हमेशा सुर्ख़ियों में बने रहने वाले श्री ज्योति डे को अज्ञात हमलावरों ने दिनदहाड़े गोलियों से भून डाला था. मुझ "सिरफिरा" को कौन और कब कैसे मारता हैं? पता नहीं है मगर कहते हैं मरे हुए को कोई नहीं मारता हैं.वैसे मैंने कल ही राष्ट्रपति से इच्छा मुत्यु प्रदान करने की मांग की हैं. लेकिन जब तक जिन्दा हूँ तब अपने लिखे हुए "सच आखिर सच होता है, सांच को आंच नहीं, जो लिखूंगा सच लिखूंगा, सच के सिवाय कुछ नहीं, सच के लिए मैं नहीं या झूठ नहीं, आज तक निडरता से चली मेरी कलम, न बिकी हैं, न बिकेगी, मेरी मौत पर ही रुकेगी मेरी कलम" शब्दों का मान रखते हुए भ्रष्टाचारियों की शिकायत करता रहूँगा. मैंने अपनी शिकायत उच्चस्तर के अधिकारीयों के पास भेज तो दी हैं. अब बस देखना हैं कि-वो खुद कितने बड़े ईमानदार है और अब मेरी शिकायत उनकी ईमानदारी पर ही एक प्रश्नचिन्ह है.
लीगल सैल से मिले वकील का शिकायती पत्र 

3 टिप्‍पणियां:

  1. ramesh ji aap apne path par sahi hain aur vakeelon ne yadi aapke sath koi badtamizi ki hai to unki shikayat BAR COUNCIL OF INDIA me kiziye yadi unhe aapki shikayat me koi sachchai dikhi to avashya hi un vakeelon ke khilaf karyavahi kee jayegi.halanki main ye manti hoon ki aaj authority ke nam par is peshe me bahut se galat log bhi aa rahe hai kintu ab in par lagam lagane kee tayyari bhi kee ja rahi hai aur aap jaise vyakti is rah par bahut achchhe kam kara sakte hain .

    उत्तर देंहटाएं
  2. परेशान क्यों होते हैं रमेश भाई... और मरने-मारने की बात कभी भी नहीं करनी चाहिए... मर या मार कर आजतक कोई भी समाज को बदलने में सफल नहीं हुआ है... समाज को केवल बेहतरीन प्रयासों से ही बदला जा सकता है... हम अगर यह छोटे की हमारा प्रयास तो बहुत ही छोटा है उससे कैसे पूरा समाज बदलेगा? तो इसके लिए यही कहूँगा कि छोटे-छोटे प्रयास ही मिलकर बड़े प्रयास बनते हैं, जैसे बूँद-बूँद से सागर बनता है. लेकिन अगर कोई बूँद सागर ना बना पाए तो उसे यह सोच कर विचलित नहीं होना चाहिए... बल्कि उसका कार्य तो कर्म करना ही है... फल की ज़िम्मेदारी तो उस मालिक की है, जिसका इस सारे निजाम को चलाने का काम है.. इसलिए हम तो अपना काम करें और उसका काम उसपर छोड़ें...

    याद रखना, छोटा सा प्रयास भी कभी बेकार नहीं जाता.. हो सकता है उसका प्रभाव हमें तत्काल दिखाई ना दे... लेकिन उसके दीर्घ कालीन प्रभाव नहीं पड़ेंगे, ऐसा हो नहीं सकता है... मैंने तुम्हे ईमेल पर अपना फोन नंबर भेजा था, हो सके तो फोन करना...



    प्रेमरस

    उत्तर देंहटाएं

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मार्मिक अपील-सिर्फ एक फ़ोन की !

मैं इतना बड़ा पत्रकार तो नहीं हूँ मगर 15 साल की पत्रकारिता में मेरी ईमानदारी ही मेरी पूंजी है.आज ईमानदारी की सजा भी भुगत रहा हूँ.पैसों के पीछे भागती दुनिया में अब तक कलम का कोई सच्चा सिपाही नहीं मिला है.अगर संभव हो तो मेरा केस ईमानदारी से इंसानियत के नाते पढ़कर मेरी कोई मदद करें.पत्रकारों, वकीलों,पुलिस अधिकारीयों और जजों के रूखे व्यवहार से बहुत निराश हूँ.मेरे पास चाँदी के सिक्के नहीं है.मैंने कभी मात्र कागज के चंद टुकड़ों के लिए अपना ईमान व ज़मीर का सौदा नहीं किया.पत्रकारिता का एक अच्छा उद्देश्य था.15 साल की पत्रकारिता में ईमानदारी पर कभी कोई अंगुली नहीं उठी.लेकिन जब कोई अंगुली उठी तो दूषित मानसिकता वाली पत्नी ने उठाई.हमारे देश में महिलाओं के हितों बनाये कानून के दुरपयोग ने मुझे बिलकुल तोड़ दिया है.अब चारों से निराश हो चूका हूँ.आत्महत्या के सिवाए कोई चारा नजर नहीं आता है.प्लीज अगर कोई मदद कर सकते है तो जरुर करने की कोशिश करें...........आपका अहसानमंद रहूँगा. फाँसी का फंदा तैयार है, बस मौत का समय नहीं आया है. तलाश है कलम के सच्चे सिपाहियों की और ईमानदार सरकारी अधिकारीयों (जिनमें इंसानियत बची हो) की. विचार कीजियेगा:मृत पत्रकार पर तो कोई भी लेखनी चला सकता है.उसकी याद में या इंसाफ की पुकार के लिए कैंडल मार्च निकाल सकता है.घड़ियाली आंसू कोई भी बहा सकता है.क्या हमने कभी किसी जीवित पत्रकार की मदद की है,जब वो बगैर कसूर किये ही मुसीबत में हों?क्या तब भी हम पैसे लेकर ही अपने समाचार पत्र में खबर प्रकाशित करेंगे?अगर आपने अपना ज़मीर व ईमान नहीं बेचा हो, कलम को कोठे की वेश्या नहीं बनाया हो,कलम के उद्देश्य से वाफिक है और कलम से एक जान बचाने का पुण्य करना हो.तब आप इंसानियत के नाते बिंदापुर थानाध्यक्ष-ऋषिदेव(अब कार्यभार अतिरिक्त थानाध्यक्ष प्यारेलाल:09650254531) व सबइंस्पेक्टर-जितेद्र:9868921169 से मेरी शिकायत का डायरी नं.LC-2399/SHO-BP/दिनांक14-09-2010 और LC-2400/SHO-BP/दिनांक14-09-2010 आदि का जिक्र करते हुए केस की प्रगति की जानकारी हेतु एक फ़ोन जरुर कर दें.किसी प्रकार की अतिरिक्त जानकारी हेतु मुझे ईमेल या फ़ोन करें.धन्यबाद! आपका अपना रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा"

क्या आप कॉमनवेल्थ खेलों की वजह से अपने कर्त्यवों को पूरा नहीं करेंगे? कॉमनवेल्थ खेलों की वजह से अधिकारियों को स्टेडियम जाना पड़ता है और थाने में सी.डी सुनने की सुविधा नहीं हैं तो क्या FIR दर्ज नहीं होगी? एक शिकायत पर जांच करने में कितना समय लगता है/लगेगा? चौबीस दिन होने के बाद भी जांच नहीं हुई तो कितने दिन बाद जांच होगी?



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