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रविवार, सितंबर 25, 2011

एक हिंदी प्रेमी की नाराजगी

दोस्तों, उपरोक्त वार्तालाप द्वारा एक हिंदी प्रेमी की नाराजगी को देखें. आज हुई उपरोक्त वार्तालाप यहाँ डालने का उद्देश्य किसी अपमान करना नहीं है. केवल सिर्फ हिंदी चाहने वालों की "कथनी और करनी" को दर्शाने की मात्र एक छोटी-सी कोशिश है. फिर भी इस प्रतिक्रिया से कोई भी आहत होता है. तब उसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूँ. गोपनीयता को देखते हुए एक हिंदी प्रेमी का नाम जाहिर नहीं कर रहा हूँ.
सिरफिरा : नमस्कार जी,क्या आप नाराज है हमसे
एक हिंदी प्रेमी: नहीं जी। नाराज क्यों होंगे? नमस्कार
सिरफिरा : दो दिन वार्तालाप के हमारे सारे प्रयास असफल हो गए थें. आप कैसे है.
एक हिंदी प्रेमी: ठीक हैं। हाँ, इधर फ़ेसबुक से दूर रह रहा हूँ। मैंने खुद को दोनों समूहों* से अलग कर लिया, क्योंकि दो दिन तक मैंने इन्तजार किया. लेकिन किसी ने अपना नाम तक देवनागरी में अपनी प्रोफाइल में नहीं लिखा। मुझे तो पहले से अन्दाजा था कि गम्भीर लोग कम ही आते हैं इन साइटों पर.
सिरफिरा : कोई बात नहीं लोगों को थोड़ा समय देना पड़ता है फिर बच्चा पैदा होते ही बोलने नहीं लग जाता है.बाकी आपकी मर्जी.
एक हिंदी प्रेमी : बच्चे की बात? भाषा पर मैं खूब जानता हूँ लोगों को। लोग गीत हिन्दी के सुनेंगे, फ़िल्म देखेंगे जी। गम्भीर नहीं होंगे। कई दिग्गज ब्लागरों से पाला पड़ा है.रमेश भाई, एक काम करें। रात में बात करते हैं।
सिरफिरा : ठीक है.
 
नोट: हिंदी के प्रचार-प्रसार के उद्देश्य से बनाये दो समूह "हम है अनपढ़ और गँवार जी" और "अनपढ़ और गँवार" की बात हो रही है.  
यहाँ पर कितने ब्लॉगर अपनी फेसबुक/ऑरकुट/गूगल की अपनी प्रोफाइल में अपना नाम देवनागरी हिंदी लिपि में लिखना पसंद करते/इच्छुक हैं?
1. मुझे हिंदी में लिखने पर खुशी होगी.....
2. हिंदी में लिखना जरुरी नहीं है....

3. हिंदी में लिखने पर परेशानी होती है...
4. हिंदी में लिखने की जानकारी नहीं है....
5. मुझे कुछ नहीं कहना है........
6. हिंदी में नाम लिखने से स्टेट्स घटता है.....
7. हिंदी में नाम लिखने पर लोग हमें "अनपढ़" समझते हैं......

(वैसे फेसबुक की अपनी प्रोफाइल में अपना नाम देवनागरी हिंदी लिपि में नाम लिखने की जानकारी और समस्या का समाधान यहाँ http://www.facebook.com/groups/anpadh/doc/172380636175360/ इस लिंक पर किया हुआ है)

3 टिप्‍पणियां:

  1. आपके इस सुन्दर प्रविष्टि की चर्चा दिनांक 26-09-2011 को सोमवासरीय चर्चा मंच पर भी होगी। सूचनार्थ

    उत्तर देंहटाएं
  2. समय मिले तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है। आपको और आपके सम्पूर्ण परिवार को हम सब कि और से नवरात्र कि हार्दिक शुभकामनायें...
    .http://mhare-anubhav.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  3. आओ हिंदी का सम्मान करें.
    जो सदस्य फेसबुक की अपनी प्रोफाइल में अपना नाम देवनागरी हिंदी लिपि में लिखने के इच्छुक हैं, वो पढ़े !

    प्रश्न:-मुझे देवनागरी में नाम लिखने से सर्च करने में परेशानी होती है....इसलिए मैंने रोमन में लिखा हुआ है.....जो भी नाम देवनागरी में लिखे हैं, वो सर्च करने पर नहीं मिलते हैं.

    उत्तर:-अपनी प्रोफाइल में हिंदी में नाम कैसे लिखें:-आप सबसे पहले "खाता सेट्टिंग " में जाए. फिर आप "नेम एडिट" को क्लिक करें. वहाँ पर प्रथम,मिडिल व लास्ट नाम हिंदी में भरें और डिस्प्ले नाम के स्थान पर अपना पूरा नाम हिंदी में भरें. उसके बाद नीचे दिए विकल्प वाले स्थान में आप अपना नाम अंग्रेजी में भरने के बाद ओके कर दें. अब आपको कोई भी सर्च के माध्यम से तलाश भी कर सकता है और आपका नाम हर संदेश और टिप्पणी पर देवनागरी हिंदी में भी दिखाई देगा. अब बाकी आपकी मर्जी. हिंदी से प्यार करो या बहाना बनाओ.

    उत्तर देंहटाएं

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मार्मिक अपील-सिर्फ एक फ़ोन की !

मैं इतना बड़ा पत्रकार तो नहीं हूँ मगर 15 साल की पत्रकारिता में मेरी ईमानदारी ही मेरी पूंजी है.आज ईमानदारी की सजा भी भुगत रहा हूँ.पैसों के पीछे भागती दुनिया में अब तक कलम का कोई सच्चा सिपाही नहीं मिला है.अगर संभव हो तो मेरा केस ईमानदारी से इंसानियत के नाते पढ़कर मेरी कोई मदद करें.पत्रकारों, वकीलों,पुलिस अधिकारीयों और जजों के रूखे व्यवहार से बहुत निराश हूँ.मेरे पास चाँदी के सिक्के नहीं है.मैंने कभी मात्र कागज के चंद टुकड़ों के लिए अपना ईमान व ज़मीर का सौदा नहीं किया.पत्रकारिता का एक अच्छा उद्देश्य था.15 साल की पत्रकारिता में ईमानदारी पर कभी कोई अंगुली नहीं उठी.लेकिन जब कोई अंगुली उठी तो दूषित मानसिकता वाली पत्नी ने उठाई.हमारे देश में महिलाओं के हितों बनाये कानून के दुरपयोग ने मुझे बिलकुल तोड़ दिया है.अब चारों से निराश हो चूका हूँ.आत्महत्या के सिवाए कोई चारा नजर नहीं आता है.प्लीज अगर कोई मदद कर सकते है तो जरुर करने की कोशिश करें...........आपका अहसानमंद रहूँगा. फाँसी का फंदा तैयार है, बस मौत का समय नहीं आया है. तलाश है कलम के सच्चे सिपाहियों की और ईमानदार सरकारी अधिकारीयों (जिनमें इंसानियत बची हो) की. विचार कीजियेगा:मृत पत्रकार पर तो कोई भी लेखनी चला सकता है.उसकी याद में या इंसाफ की पुकार के लिए कैंडल मार्च निकाल सकता है.घड़ियाली आंसू कोई भी बहा सकता है.क्या हमने कभी किसी जीवित पत्रकार की मदद की है,जब वो बगैर कसूर किये ही मुसीबत में हों?क्या तब भी हम पैसे लेकर ही अपने समाचार पत्र में खबर प्रकाशित करेंगे?अगर आपने अपना ज़मीर व ईमान नहीं बेचा हो, कलम को कोठे की वेश्या नहीं बनाया हो,कलम के उद्देश्य से वाफिक है और कलम से एक जान बचाने का पुण्य करना हो.तब आप इंसानियत के नाते बिंदापुर थानाध्यक्ष-ऋषिदेव(अब कार्यभार अतिरिक्त थानाध्यक्ष प्यारेलाल:09650254531) व सबइंस्पेक्टर-जितेद्र:9868921169 से मेरी शिकायत का डायरी नं.LC-2399/SHO-BP/दिनांक14-09-2010 और LC-2400/SHO-BP/दिनांक14-09-2010 आदि का जिक्र करते हुए केस की प्रगति की जानकारी हेतु एक फ़ोन जरुर कर दें.किसी प्रकार की अतिरिक्त जानकारी हेतु मुझे ईमेल या फ़ोन करें.धन्यबाद! आपका अपना रमेश कुमार जैन उर्फ़ "सिरफिरा"

क्या आप कॉमनवेल्थ खेलों की वजह से अपने कर्त्यवों को पूरा नहीं करेंगे? कॉमनवेल्थ खेलों की वजह से अधिकारियों को स्टेडियम जाना पड़ता है और थाने में सी.डी सुनने की सुविधा नहीं हैं तो क्या FIR दर्ज नहीं होगी? एक शिकायत पर जांच करने में कितना समय लगता है/लगेगा? चौबीस दिन होने के बाद भी जांच नहीं हुई तो कितने दिन बाद जांच होगी?



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